काफी दिनों से चर्चा में है-अभिव्यक्ति की आज़ादी. लोग इसकी आड़ में कुछ भी बोलते रहते हैं. बयान बहादुर तो बहुत ही बड़े वाले हैं, संवेदनशील मुद्दों पर भी कब, क्या बोल जाएँ, कहना मुश्किल है.

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बयान बहादुर संभल जाओ

लेकिन, साहबों! अब ज़रा संभलकर बोलना, वरना लेने के देने पड़ जायेंगे, क्योंकि सुप्रीमकोर्ट आपके लिए लक्ष्मण रेखा तय करने वाला है. उसके बाद अगर आपने रेखा पार की तो ‘चीर’ हरण निश्चित है.


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सुप्रीम कोर्ट इस बात पर विचार कर रहा है कि, जनप्रतिनिधि और अधिकारी किस हद तक बयान दे सकते हैं. इसके लिए अटार्नी जनरल मुकुल रोहतगी और वरिष्ठ वकील फली एस नरीमन के बाद अब एक और वकील हरीश साल्वे को इस मसले पर अदालत की मदद करने को कहा गया है.

न्यायमूर्ति दीपक मिश्र की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा है कि यह मुद्दा अभिव्यक्ति की आज़ादी किस हद होनी चाहिए, इस बात पर केन्द्रित है. क्या अभिव्यक्ति की आज़ादी स्वच्छंद रूप से जी रहे व्यक्ति के अधिकार और जीने की आज़ादी को प्रभावित तो नहीं कर रहा.

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असीमित नहीं है आज़ादी

सुप्रीमकोर्ट ने बुलंदशहर गैंगरेप मामले पर आज़म खान के बयान को लेकर सख्ती दिखाई थी. उस समय उन्होंने माफ़ी तो मांग ली थी, लेकिन आगे संवेदनशील मुद्दों पर इस तरह का बयान न आयें, जिससे किसी की भावनाएं आहत हों इसके प्रति कोर्ट गंभीर है. इसीलिए जन प्रतिनिधियों और पब्लिक ऑफिसों में बैठे अधिकारियों के बयानों की सीमा निर्धारण की बात शीर्ष अदालत ने कही है.

फली एस नरीमन ने कहा कि, उन्हें बोलने व अभिव्यक्ति के अधिकार और जीवन जीने के अधिकार के बीच बैलेंस देखने के लिए के और अधिक वक्त चाहिए. सुनवाई के दौरान पीठ ने ये स्पष्ट किया कि अभिव्यक्ति की आज़ादी असीम नहीं है. अनुच्छेद 19 (2) इस पर पाबंदी लगाता है.

अटर्नी जनरल ने अपना मत स्पष्ट किया कि इस तरह की टिप्पणी पर आपराधिक अभियोजन का प्रावधान नहीं है. इस पर पीठ ने कहा कि, इस पर अगर कोई क़ानून नहीं है तो क्या कोई कुछ भी बोल सकता है. ये मामला केवल अभिव्यक्ति की आज़ादी का ही नहीं है बल्कि पीड़ित के संरक्षण और निष्पक्ष ट्रायल का भी मसला है.

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मामले की अगली सुनवाई 20 अप्रैल को होनी है, जिसमें सुनवाई के दौरान अदालत में मौजूद वरिष्ठ वकील हरीश साल्वे को मदद के लिए पीठ ने कहा है.

साहबानों अब अगर हाथ छोड़कर आपने बोला तो समझो भैया कि गई भैंस पानी में. इसलिए जो भी बोलना है तोलमोल कर बोलना. वरना तो भैया आपको ये भी पता है कि हर बार माफ़ी नहीं मिलती..

…बयान बहादुरों के हित में जारी…

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