कहते हैं कि जब भी मन परेशान हो, तो भगवान की शरण में चले जाना चाहिए. दादी-नानी की बातें सुनें, तो वो अक्सर यही कहती हैं कि दिनभर में एक बार तो भगवान के दर्शन ज़रूर करना चाहिए. या फिर हफ्ते में एक बार कम से कम भजन-कीर्तन करना चाहिए. अगर ये भी पॉसिबल न हो, तो थोड़ी देर ‘ओम’ बोलकर मेडीटेशन ही कर लो.

भजन-कीर्तन

 


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हम सब जानते हैं कि मेडीटेशन करना या ‘ओम’ बोलने से मन को कितनी शांति मिलती है. इससे पॉजिटिव एनर्जी आती है और ऐसा लगता है मानो दुनिया की सारी टेंशन आपसे दूर हो.

ओम सिर्फ एक सिंबल या साउंड नहीं है. इसकी एहमियत इससे भी ऊँची है. 10 मिनट के लिए भी अगर हम ‘ओम’ का जाप करते हैं, तो दिनभर की थकान और परेशानियाँ हमसे कोसों दूर चली जाती हैं. ओम बोलना महज़ हमें शांति और सुकून ही नहीं देता, इसके कई फायदे हैं जिनसे हम अनजान हैं. ये फायदे क्या हैं, आज हम आपको इस पोस्ट में बताएँगे.

ओम (AUM) और ओम (OM)

संस्कृत में ओ (O) को ओ (AU) कहा जाता है. AUM का मतलब संस्कृत में समय के हिसाब से बताया गया है.

A- इसे वाकिंग स्टेट यानी की जागरूकता कहा जाता है.

U- इसे ड्रीम स्टेट यानी की स्वप्न देखना कहा जाता है.

M- इसे दीप स्लीप यानी गहरी निद्रा में जाना कहा जाता है.

ओम बोलने के बाद थोड़ी देर के लिए पॉज लिया जाता है. ऐसा इसलिए क्योंकि माना जाता है कि थोड़ी देर तक ॐ का जाप करने के बाद इंसान पीसफुल स्टेट ऑफ़ माइंड में होता है.

इश्वर से कनेक्टेड फील होता है

पूजा करने का सबसे आसन और पवित्र योग होता है ओम. थोड़ी देर के लिए ही सही, लेकिन ऐसा लगता है जैसे हम इश्वर से बातें कर रहे हों.

परेशानियों से मिलती है मुक्ति

दिनभर में अगर 5 मिनट भी ओम बोलकर ज़प करेंगे, तो पूरे दिनभर की थकान और परेशानी का मनो अंत हो जाएगा. इसके साथ ही ओम मेडीटेशन करने से सांस लेने की दिकत भी दूर होती है.

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बढ़ती है सोचने की क्षमता

ओम बोलते वक़्त हमारी सारी एनेर्जी और ब्रेन पॉवर एक तरफ एकांत्रित हो जाता है. इससे पॉजिटिव एनेर्जी मिलती है और साथ ही सोचने की क्षमता भी बढती है. जितने भी नेगेटिव थॉट्स होते हैं, वो सब दूर हो जाते हैं.

बना रहता है कंसंट्रेशन

रोजाना ओम मेडीटेशन करने से कंसंट्रेशन पॉवर तेज़ होती है. इससे बेहतर चीज़ों पर कंसन्ट्रेट करने में मदद मिलती है और दुनिया की बेकार के एशोआराम से मन हटता है.

खुद की होती है पहचान

ओम मंत्रा चैंट करने से खुद को पहचानने में भी मदद होती है. इसका मतलब ये नहीं है कि आप खुद के बारे में कुछ जानते ही नहीं हैं. इसका मतलब ये है कि दुनियादारी से दूर जब आप भगवान की शरण में होते हैं, तो आपका सारा ध्यान सिर्फ और सिर्फ खुद को पवित्र बनाने में लगा होता है. मन को सुकून मिलता है.

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