आप इसके करीब आ सकते हैं। ये नुकसान नहीं पहुंचाती है और किसी पर हमला भी नहीं करती है। ये मगरमच्छ भगवान का वाहन है। यह बातें श्री आनंदपद्मनाभ स्वामी मंदिर के कर्मचारी चंद्रशेखरन यहां आने वाले श्रद्धालुओं से कहते हैं।

यह मगरमच्छ कासरगोड जिले के अनंतपुरा गांव के इस मंदिर में बने तालाब में रहती है। इस मगरमच्छ का नाम बाबिया है। यह चर्चा में तब आई, जब पता चला कि यह पूरी तरह से शाकाहारी और किसी भी तरह के मांस से दूर रहती है। श्री आनंदपद्मनाभ स्वामी मंदिर को लोग मूलस्थानम के नाम से भी जानते हैं। यह मंदिर तिरुवनंतपुरम में है।

मगरमच्छ भगवान का वाहन


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मंदिर की मान्यता है कि यह मगरमच्छ भगवान पद्मनाभन की वाहन है। देशभर में यहां रोजाना सैकड़ों लोग आते हैं। उनका मानना होता है कि एक बार शाकाहारी मगरमच्छ बाबिया को देखकर उनकी मन्नत पूरी हो सकती है।

बाबिया इस मंदिर के तालाब में 70 साल से रहती है। बाबिया सुबह-शाम मं‍दिर का प्रसाद खाने के लिए तालाब के किनारे पर आती है। इतना ही नहीं, मंदिर के पुजारी इसके दोस्त बन चुके हैं। पुजारी उसी तालाब में नहाते हैं, जिसमें बाबिया रहती है। कई बार पुजारी और बाबिया आमने-सामने आते हैं, फिर भी सब ठीक रहता है। पुजारी उनकी पूजा भी करते हैं।

मान्यता है कि 3000 साल पहले दिवाकर मुनि विल्वमंगलम स्वामी ने यहां तपस्या की थी, जिससे प्रसन्न होकर भगवान विष्णु अव‍तरित हुए। उन्होंने विल्वमंगलम स्वामी को अपनी मूर्ति बनाने की आज्ञा दी। एक‍ दिन विल्वमंगलम अपनी पूजा में व्यस्त थे। तभी भगवान विष्‍णु एक बच्चे के रूप में उनके सामने आए। बच्चे ने विल्वमंगलम को पूजा में उनकी मदद करने का आग्रह किया। धीरे-धीरे विल्वमंगलम और बच्चे में अच्छी दोस्ती हो गई। समय बीतने के साथ विल्वमंगलम थोड़े अहंकारी हो गए, तो भगवान विष्‍णु ने उन्हें सबक देने का फैसला किया।

एक दिन विष्‍णुरूपी बच्चे ने खुद को विल्वमंगलम से अलग रखने का फैसला किया। इससे नाराज होकर विल्वमंगलम ने उसके साथ बुरा बर्ताव किया। इसके बाद बच्चा अचानक यह कहते हुए गायब हो गया कि उसे खोजने के लिए विल्वमंगलम को अनंथनकट के जंगल की उस गुफा में पहुंचना होगा, जिसमें भगवान अनंथा रहते हैं। विल्वमंगलम ने बच्चे को खोजने का फैसला किया। जब वह गुफा तक पहुंचे, तो उन्हें वहां मगरमच्छ मिली। इसी मगरमच्छ को बाबिया माना जाता है।

मंदिर के पुजारी बताते हैं कि बाबिया आज भी इसी गुफा में रहती है। वह दोपहर के वक्त धूप लेने बा‍हर आती है। चूंकि वह‍ कभी मंदिर के तालाब से नहीं निकलती और प्रसाद ही खाती है, इसलिए उसे शाकाहारी मान लिया गया है। दस साल से बाबिया को खाना देने वाले मंदिर के कर्मचारी चंद्र प्रकाश बताते हैं, ‘बाबिया को सुबह 8 बजे और दोपहर बाद खाना खिलाया जाता है। मैं चावल की बॉल बनाकर उसके मुंह में फेंककर खिलाता हूँ।’

बाबिया के बारे में मगरमच्छ विशेषज्ञ अनिर्बान चौधरी बताते हैं, ‘यह मुग्गर प्रजाति की मगरमच्छ है, जिसे मछलियां पसंद होती हैं। इसके साथ ही ये मगरमच्छ हिरण जैसे जानवर भी खाते हैं। लेकिन बाबिया की बात कुछ अलग है। ये मगरमच्छ बहुत समझदार होते हैं। खुद को जिंदा रखने के लिए इन्हें जो भी आसानी से मिलता है, उसे खा लेते हैं।’

अनिर्बान कहते हैं कि मगरमच्छ तभी हमला करते हैं, जब उन्हें खतरा महसूस होता है। लेकिन मंदिर में सभी उन्हें चाहते हैं, खिलाते-पिलाते हैं। ये बात वो समझती है, इसीलिए किसी के लिए खतरा नहीं बनती है।

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