समाजवादी पार्टी से अपदस्थ हुए राष्ट्रीय अध्यक्ष मुलायम सिंह यादव के साल 2014 में दिए गये उस बयान पर काफी चर्चा हुयी थी, जिसमें उन्होंने बलात्कार केस में आरोपियों को सजा होने पर कहा था…

लड़के हैं गलतियाँ हो जाती हैं. अब उसके लिए फांसी चढ़ा दें क्या?

उस समय लोगों ने उनके बयान की निंदा की. किसी ने कहा सठिया गये हैं, तो किसी ने कुछ कहा तो किसी ने कुछ.


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पर मुलायम नहीं माने. अगले साल 2015 में बदायूं गैंगरेप पर उन्होंने कह दिया

एक महिला के साथ चार लोग कैसे बलात्कार कर सकते हैं, ये व्यावहारिक नहीं है.

इस बयान पर खूब बवाल हुआ. पर तब किसी ने नहीं सोचा होगा कि ये बयान कभी ‘संस्कार’ बन कर सामने आएगा.

 

खैर, ताज़ा मामला ये है कि समाजवादी पार्टी के मंत्री गायत्री प्रजापति पर नाबालिग से बलात्कार का आरोप है.

उनके बचाव में सपा के सांसद, पार्टी के पूर्व मुखिया और परिवार के आदर्श पुरुष के पदचिह्नों का अनुसरण करने वाले धर्मेन्द्र यादव ने पारिवारिक परंपरा का निर्वहन किया और जनता के सामने उदगार व्यक्त किये.

उनका कहना था

मंत्री पर रेप का आरोप कोई बड़ी बात नहीं है. मोदी जी प्रजापति के पीछे पड़े हैं, उनको और कोई काम नहीं है. उनको अपनी सरकार के मंत्री मेघचंद निहाल दिखाई नहीं दे रहे हैं. मोदी जी बस गायत्री का जाप कर रहे हैं.

उनके बयान से एक बात ये भी स्पष्ट हुयी कि धरतीपुत्र का बयान भी सठियाने पर नहीं, बल्कि स्वस्थ अवस्था में आया था. संस्कार आते तो अपने बड़ों से ही हैं. और यादव कुल में मुलायम को छोड़कर सब कठोर हैं. ये भी सच है कि संतान को अपने कुल की परम्परा का निर्वहन करना चाहिए, सो सर्व श्री धर्मेन्द्र यादव जी ने वह भी किया.

उनका बयान अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस से ठीक पहले आया. इसलिए ये भी माना जा सकता है कि मीडिया ने उनसे महिला दिवस पर अपने विचार व्यक्त करने को नहीं कहा, इसीलिए उन्होंने स्वयं अपने उद्गारों को प्रकट किया.

देश के लोकमंदिर का एक सदस्य के तौर पर प्रतिनिधित्व करने वाले ऐसे महानुभाव पर मंदिर को कितना गर्व होगा, अगर वो मंदिर बोल सकता तो ज़रूर बता देता. वैसे रेप पर चर्चा करके चर्चित होने का इनका धंधा रईस से भी बड़ा है. क्षेत्रीय में हैसियत न होते हुए भी ये राष्ट्रीय हो जाते हैं.

फ़िलहाल तो जितना बोलने के बारे में महानुभाव स्वतंत्र हैं उतना ही स्वतंत्र जनता जनार्दन है. बस फर्क इतना है दोनों के कहने का तरीका अलग है.

दादा जी कहा करते थे कि, बच्चा खुद का ही होशियार मत समझो. इहाँ हर आदमी होशियार है. सबको अपने संस्कार बलवान बनाते हैं. हम उनकी बात का मतलब आज तक नहीं समझ पाए. आप लोगों को समझ आये ज़रूर बताना, इंतज़ार रहेगा.

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