रांची। बिहार के चारा घोटाले में रांची की विशेष सीबीआई अदालत ने राजद प्रमुख और बिहार के पूर्व मुख्‍यमंत्री लालू प्रसाद यादव समेत 15 आरोपियों को दोषी पाया है, जबकि पूर्व मुख्‍यमंत्री जगन्नाथ मिश्रा समेत 7 को निर्दोष माना है। कोर्ट 3 जनवरी को सजा का ऐलान करेगा, तब तक लालू यादव समेत सभी दोषी जेल में रहेंगे। बहुचर्चित मामले का फैसला जानने के लिए कोर्ट के बाहर राष्ट्रीय जनता दल के समर्थकों की भारी भीड़ जमी रही। इस दौरान किसी भी स्थिति से निपटने के लिए फ़ोर्स भी तैनात कर दी गयी है। राष्ट्रीय जनता दल के अध्यक्ष लालू यादव अपने बेटे व बिहार के पूर्व उपमुख्यमंत्री तेजस्वी यादव के साथ कोर्ट पहुंचे थे।

बिहार के चारा घोटाले

बिहार के चारा घोटाले का काला चिट्ठा

बिहार पुलिस ने साल 1994 में गुमला, रांची, पटना, डोरंडा और लोहरदगा जैसे कई कोषागारों से फर्ज़ी बिलों के ज़रिए 900 करोड़ रुपए की अवैध निकासी के मामले दर्ज किए।


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सरकारी कोषागार और पशुपालन विभाग के कई सौ कर्मचारी गिरफ्तार कर लिए गए। कई ठेकेदार और सप्लायर भी पकड़े गए। इनके खिलाफ मुकदमा दर्ज किया गया।

विपक्षी दलों की मांग के बाद मामले की जांच सीबीआई को सौंपी गई। सीबीआई ने इसकी कमान संयुक्त निदेशक यूएन विश्‍वास को सौंपी।

सीबीआई ने कहा कि चारा घोटाले के सभी बड़े आरोपियों के रिश्‍ते राष्‍ट्रीय जनता दल और अन्य पार्टियों के शीर्ष नेताओं से हैं। एजेंसी ने दावा किया कि काली कमाई का बड़ा हिस्सा नेताओं के पास गया, इसके सबूत भी जुटा लिए गए हैं।

सीबीआई ने इसे सिर्फ चारा घोटाला नहीं, पशुपालन घोटाले के तौर पर देखा। पशुपालन विभाग के अधिकारियों ने चारे, पशुओं की दवा आदि की सप्लाई के लिए करोड़ों रुपए के फ़र्जी बिल कोषागारों से वर्षों तक नियमित रूप से भुनाए। बिहार के मुख्य लेखा परीक्षक ने इसकी जानकारी राज्य सरकार को समय-समय पर भेजी, लेकिन बिहार सरकार ने इसकी ओर कोई ध्यान नहीं दिया।

हाल ये हो गया कि बिहार में कई-कई वर्षों तक विधानसभा बजट पारित नहीं किया गया। राज्य का सारा काम लेखा अनुदान के सहारे चलता रहा।

सीबीआई ने दावा किया कि तत्कालीन मुख्‍यमंत्री को इस मामले की पूरी जानकारी थी। उन्होंने कई मौकों पर राज्य के वित्त मंत्रालय के प्रभारी के रूप में सभी निकासियों की अनुमति भी दी।

सीबीआई ने कहा कि यह सिर्फ भ्रष्‍टाचार नहीं, इसमें राज्य क कर्मचारी, नेता और व्यापारी सभी शामिल थे।

इस मामले में बिहार के पूर्व मुख्‍यमंत्री डॉक्टर जगन्नाथ मिश्र को गिरफ्तार किया गया। फिर कई और मंत्री भी गिरफ्त में लिए गए।

सीबीआई ने लालू प्रसाद यादव के ख़िलाफ़ आरोप पत्र दाख़िल किया, जिसके बाद उन्हें अपने पद से इस्तीफ़ा देना पड़ा और बाद में सुप्रीम कोर्ट से ज़मानत मिलने तक वे कई महीनों तक जेल में रहे।

इस बीच बिहार से अलग हुए झारखण्‍ड राज्य के मामलों की सुनवाई पटना हाईकोर्ट में होगी या रांची हाईकोर्ट में, इस पर भी कानूनी बहस चली।

तीन अक्तूबर 2013 को रांची स्थित सीबीआई के विशेष न्यायाधीश प्रवास कुमार सिंह की अदालत ने कांड संख्या आरसी 20 ए/96 चाईबासा कोषागार से कथित तौर पर 37.7 करोड़ की अवैध निकासी से जुड़े चारा घोटाले के एक मामले में लालू यादव को पांच साल की सुनाई थी। साथ ही अदालत ने 25 लाख रुपए का जुर्माना भी अदा करने को कहा था।

चाईबासा तब अविभाजित बिहार का हिस्सा था. हालांकि उस मामले में लालू प्रसाद फिलहाल जमानत पर हैं। लेकिन सज़ायाफ्ता होने के बाद वे संसद की सदस्यता गंवा बैठे और चुनाव लड़ने के भी अयोग्य हो गए।

इसी मामले में तब लालू प्रसाद के अलावा डॉ जगन्नाथ मिश्र को चार साल कारावास तथा 21 लाख रुपए जुर्माने की सज़ा सुनाई गई थी। चारा घोटाले के इस मामले में 44 अभियुक्तों को दोषी ठहराया गया था।

मई 2017 में सुप्रीम कोर्ट ने सीबीआई की अपील को मंजूर करने के साथ लालू प्रसाद के ख़िलाफ़ चारा घोटाले से संबंधित अलग-अलग मामलों में मुकदमा चलाने का आदेश दिया था। सुप्रीम कोर्ट ने हाइकोर्ट के फैसले को रद्द करते हुए कहा था कि प्रत्येक अपराध के लिए पृथक सुनवाई होनी चाहिए। साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने निचली अदालत को इन मामलों में नौ महीने में सुनवाई पूरी करने को कहा है।

नवंबर 2014 में झारखंड हाइकोर्ट ने लालू प्रसाद को राहत देते हुए कहा था कि एक मामले में दोषी ठहराए गए व्यक्ति के खिलाफ इन्ही धाराओं के तहत मिलते-जुलते अन्य मुकदमों में सुनवाई नहीं हो सकती।

रांची की अदालत में चारा घोटाले के जिस मामले की सुनवाई होनी है। उसमें लालू के अलावा बिहार के पूर्व मुख्‍यमंत्री डॉक्टर जगन्नाथ मिश्र समेत 22 लोग अभियुक्त हैं। कोर्ट ने सभी को पेश होने का आदेश दिया है।

देवघर कोषागार से 84.54 लाख रुपये की अवैध निकासी से जुड़े इस मुकदमे (आरसी 64ए/96) में 15 दिसंबर को दोनों पक्षों की बहस पूरी हुई थी। इसी मामले में फैसला सुनाया जाना है।

लालू यादव की पैरवी कर रहे वकील प्रभात कुमार का कहना है कि इस मामले में दो पूर्व मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव और डॉ जगन्नाथ मिश्र के अलावा पूर्व मंत्री डॉ आरके राणा, विद्यासागर निषाद, पूर्व सांसद जगदीश शर्मा और लोकलेखा समिति के पूर्व अध्यक्ष ध्रुव भगत, वरिष्ठ अधिकारी रहे बेक जुलियस, महेश प्रसाद, फूलचंद्र सिंह आरोपी हैं। अभियु्क्तों के खिलाफ मुख्य रूप से भारतीय दंड संहिता की धारा 420, 120 बी, 467, 470 के अलावा भ्रष्टाचार निवारण क़ानून की धाराएं लगाई गई हैं।

धारा 120 बी आपराधिक साजिश और 420 धोखा और बेइमानी के अपराध को साबित करती है। इसके तहत सात साल की सजा का प्रावधान है। हालांकि वकील प्रभात कुमार को उम्मीद है कि इस मुकदमे में लालू यादव बरी हो जाएंगे।

लालू ने बिहार से रांची जाने से पहले मीडिया से बातचीत में कहा था कि पहले अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार और अब नरेंद्र मोदी की सरकार उनके पीछे पड़ी है। उनके परिवार वालों को भी परेशान किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि भाजपा-एनडीए गठबंधन की सरकार 25-30 साल से उन्हें परेशान कर रही है, कोल्हू के बैल की तरह पेर रही है। हालांकि लालू ने यह दावा भी किया कि इस मामले में किसी भी फैसले से उनके परिवार और राष्‍ट्रीय जनता दल पर किसी तरह का असर नहीं आएगा।

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