विधानसभा चुनाव चल रहा है. हर नेता आ रहा है और कह रहा है वोट दो- वोट दो. भाई वोट ही तो दे रहे हैं क्योंकि वही दे सकते हैं. नोट तो मोदी जी ने ले लिए हैं. उनको कालेधन और भ्रष्टाचार की सफाई की इतनी चिंता थी कि उसके चक्कर में हमें भी निपटा दिया. बेटी की शादी के लिए रुपये जोड़-जोड़ के रखे थे. क्या पता था कि आज बैंक में जमा कर रहे हैं, कल से निकलना ही बंद हो जाएगा.

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जौनपुर की मूली की परेशानी

हमारे जौनपुर की मूली तक डर के मारे छोटी होने लगी है. सोच रही है कि कहीं हमारे बड़े होने पर हमे भी भ्रष्ट कहकर हमारा ही सफाया न होने लगे. हम जौनपुर वालों की परेशानी मोदी जी को दिखी ही नहीं.


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एक तो हम, लोगों की दबंगई से पहले ही परेशान थे, ऊपर से ये परेशानी. पहले हमारे यहाँ ‘नेवार’ जाति की मूली बहुत बड़ी हुआ करती थी. अपनी कद काठी के लिए मशहूर इस मूली को शायद वायुमंडल का लकवा मार गया है, इसीलिए ये अब छोटी हो गयी है.

चुनाव से पहले अखिलेश भइया से भी गुहार लगाई थी, पर क्या पता था निर्मोही निकलेंगे. न तो हमारी बात सुनी और न ही कुछ मदद की.

मोदी जी! भ्रष्टाचार सफाई से अगर मौका मिल गया हो, तो हमारी मूली बचाने की तरफ भी ध्यान दे लीजिये, ताकि हमारे जौनपुर की शान ये मूली बरकरार रहे.

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गोमती नदी के किनारे बलुआघाट, ताड़तला, पानदरीबा, मुफ़्ती मोहल्ला, मुल्ला टोला सहित दो दर्जन से ज्यादा गाँवों के किसान इसे बोते आ रहे हैं. 5-6 फीट लम्बी होने के बाद भी ये मूली नरम होती है. इसके पीछे यहाँ के पानी और मिट्टी का बड़ा योगदान है.

यहाँ गोमती, सई, बिसुही, पीली और वरुणा पांच नदियाँ बहती हैं. हमारी ये मूली, बढ़ती जनसँख्या और कम उपजाऊ होती ज़मीन के चलते अपना अस्तित्व खोती जा रही है. दो तीन दशक पहले जहां मूली उगाई जाती थी, अब वहां पर मकान खड़े हैं.

अब मूली भी दो से ढाई फीट लम्बी और तीन से पांच किलो की ही हो पा रही है. मूली के आकार और स्वाद का मिजाज़ यहाँ पर्यावरण ने बिगाड़ दिया है. जौनपुर में गोमती नदी को प्रदूषण से बचाने में लगे बीएचयू के डॉ विजयनाथ मिश्र बताते हैं,’किसान गोमती के पानी से मूली के खेत की सिंचाई करते थे, अब वही प्रदूषित हो गया है. जिससे मूली बौनी हो गयी है.’

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मूली पर ध्यान आकृष्ट करने के लिए 2014 में राजभवन लखनऊ में लगी प्रदर्शनी में इसे भेजा गया था. मुख्यमंत्री अखिलेश यादव को इस समस्या से भी अवगत कराया गया था, लेकिन उन्होंने भी ध्यान नहीं दिया.

किसान भाई चाहते हैं कि मूली इतिहास न बन जाए, इसलिए इसके संरक्षण के लिए ठोस कदम उठाये जाएँ. दिवंगत भोजपुरी गायक बालेश्वर यादव का एक गीत सबकी जुबान पर है, निकु लागे टिकुलिया गोरखपुर के, मोटकी मुरईया जवानपुर के. इस मूली ने 1857 में देशभक्तों को नदी पार करने के लिए मदद की थी. चूंकि ये मूलियाँ बड़ी थीं इसलिए अंग्रेजों से बचने के लिए इन मूलियों को रखकर क्रांतिकारी नदी पार कर गये और अपनी जान बचाई.

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किसान संक्रांति पर बेटियों को भेजी जाने वाली खिचड़ी में लाई, चूरा, गुड़, गट्टा, आलू, गोभी के साथ दो चार जौनपुरी मूली ज़रूर भेजते थे. लेकिन अब जब मूली ही नहीं होगी तो क्या कद्दू भेजेंगे. मोदी जी देख लो हमारी मूली की तरफ, कितनी छोटी हो गयी है.

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