ओ तेरे की… जिस त्रिकोणमिति ने स्कूल-कॉलेज में खूब तंग किया, अब उसी का इतिहास बदल गया है। सच्ची, इतिहास में इसे यूनानी सभ्यता की देन बताया जाता है। अब खोज से पता चला है कि इस पद्धति का इस्तेमाल यूनानियों से सदियों पहले बेबीलोन सभ्यता के लोग कर रहे थे।

क्या कहता है इतिहास

इतिहास के मुताबिक यूनानी खगोलशास्त्री हिप्पाकर्स त्रिकोणमिति के जनक हैं। उनका जीवनकाल 120 ईसापूर्व के आसपास था। लेकिन ऑस्ट्रेलिया स्थित न्यू साउथ वेल्स यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं को बेबीलोन सभ्यता की खुदाई से मिली एक पट्टिका मिली है।

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1722 ईसा पूर्व की पट्टिका

यह पट्टिका करीब 1722 ईसा पूर्व की है। इसपर त्रिकोणमित के टेबल उकेरे गए हैं। प्रमुख शोधकर्ता इंडियाना जोंस ने कहा, इस टैबलेट को प्लीम्पटन 322 नाम दिया गया है। इसकी खोज 1900 सदी में अमेरिकी पुरातत्ववेत्ता और राजनयिक इगर बैंक ने दक्षिणी इराक से की थी।

अब पढ़ने में मिली सफलता

तब से इस पट्टिका को पढ़ा नहीं जा सका था। हाल ही में इसे पढ़ने में सफलता मिली है। जोंस ने कहा कि यह अति प्रचीन और सटीक त्रिकोणमिति टेबल है। संभवत: इसका इस्तेमाल मंदिरों और राजमहलों के निर्माण के लिए किया जाता था।

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पट्टिका का तरीका थोड़ा अलग

न्यू साउथ वेल्स यूनिवर्सिटी से संबद्ध स्कूल ऑफ मैथमेटिक्स और स्टेटिस्टिक में प्रोफेसर और शोधदल के सदस्य डेनियल मैंसफिल्ड ने कहा कि इस पट्टिका का तरीका त्रिकोणमिति के मौजूदा स्वरूप से यह भिन्न है। हम 10 आधारों के आधार पर गणना करते हैं।

पुरानी गणना अधिक सटीक

बेबीलोन के गणितज्ञ 60 के आधार पर गणना करते थे। दिलचस्प यह है कि पुरानी गणना अधिक सटीक थी, क्योंकि इन्हें तीन से भाग करना आसान होता था। दूसरा अंतर कि यह अनुपात आधारित था, जबकि मौजूदा समय में कोण एवं गोले के आधार पर गणना होती है।

आज भी कारगर है यह तकनीक

शोधकर्ताओं  ने बताया कि बेबीलोन सभ्यता में इस्तेमाल त्रिकोणमिति का पिछले तीन हजार साल से इस्तेमाल नहीं हुआ है। लेकिन सर्वे, कंप्यूटर ग्राफिक्स और शिक्षा के क्षेत्र में आज भी प्रासंगिक है।

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