कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी के सामने सबसे बड़ी जिम्मेदारी है अपनी पार्टी को खोई प्रतिष्ठा वापस दिलाने की। ऐसे ही कुछ हालात कांग्रेस के सामने तब पैदा हुए थे, जब 1996 में नरसिंहा राव की सरकार गिर गई थी।

तब भी खराब थी पार्टी की हालत

केंद्र में नरसिंहा राव की सरकार जाने के बाद पार्टी की हालत खस्ता दिख रही थी। सरकार गिरने के बाद हुए चुनाव में भाजपा और जनता दल ने भारी बढ़त हासिल की और भाजपा ने गठबंधन की सरकार बना ली थी।

1998 में अध्यक्ष बनीं सोनिया

ये सब देखकर सोनिया गांधी ने कांग्रेस नेताओं के दबाव में 1997 में कोलकाता के प्लेनरी सेशन में कांग्रेस की प्राथमिक सदस्यता स्वीकार की थी। इसके बाद अप्रैल 1998 में वह कांग्रेस अध्यक्ष बनीं। हालांकि, राजीव गांधी की हत्या के बाद वह इस पद को ठुकरा चुकी थीं।


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पार्टी को दिलाई थी कामयाबी

अध्यक्ष बनने के बाद सोनिया ने अपनी पार्टी की हालत सुधारने में कोई कसर नहीं रखी। इसका नतीजा भी निकला। 2004 और 2009 केंद्र में कांग्रेस ने सरकार बनाई। अब जबकि कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी को जिम्मा मिला है, तब भी कांग्रेस की हालत खस्ता है।

2014 में लगा करारा झटका

2014 में कांग्रेस को बड़ा झटका लगा और नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा ने पूर्ण बहुमत के साथ सरकार बनाई। इसके बाद महाराष्ट्र, हरियाणा, यूपी, उत्तराखंड, गोवा, असम समेत कई सूबों में पार्टी ने अपने दम पर सरकार बनाई।

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कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी की चुनौतियां

दूसरी तरफ कांग्रेस एक के बाद चुनाव हारती गई. यहां तक कि निकाय चुनावों में भी कांग्रेस अपनी साख नहीं बचा पा रही है। ऐसे में अब राहुल के सामने सबसे ज्वलंत चुनौती गुजरात चुनाव है। इसके बाद 2019 के लोकसभा चुनाव। अब सवाल यह है कि क्या राहुल मां की तरह कांग्रेस को 2004 और 2009 जैसी जीत दिलाने में कामयाब हो पाएंगे?

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