महान गायक पंडित भीमसेन जोशी का 4 फरवरी को जन्मदिन होता है. उनका यह भजन सुनिए और उनके ये दिलचस्प किस्से पढ़िए. ये किस्से निकले हैं किताब ‘कालजयी सुर’ से. जिसे लिखा है, गजेंद्र नारायण सिंह ने. किताब वाणी प्रकाशन से छपी है.

पंडित भीमसेन जोशी

शराब पीने के लिए गायब हुए, फिर स्टेज किनारे से झांके

साल 1948. जालंधर के ‘हरिवल्लभ’ संगीत समारोह में भीमसेन जोशी को बुलाया गया था. यहां मशहूर सितारनवाज उस्ताद रईस खां भी थे. आदत से लाचार जोशीजी एकाएक दो शागिर्दों को लेकर पीने के लिए गायब हो गए. सब अचंभे में, कि पंडितजी कहां गए. आयोजकों के सामने बड़ी समस्या खड़ी हो गई कि पंडाल में मौजूद 20 हजार श्रोताओं के सामने किसे पेश किया जाए. रईस ख़ां से विनती करके उन्हें सितार बजाने के लिए राजी कर लिया.


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उनका वादन शुरू ही हुआ था कि अचानक शोरगुल सुनायी पड़ा. ख़ां साहब लगे रहे, यह समझ कर कि श्रोताओं पर उनके वादन का रंग चढ़ रहा है. पर इतने में स्टेज के दाएं तरफ के पैसेज से भीमसेन जोशी नजर आए. शोरगुल की वजह यही थी कि श्रोताओं ने उन्हें देख लिया था. आयोजकों को लगा कि अब अगर पंडित जी को श्रोताओं की नजर से दूर नहीं किया गया तो पंडाल में बवाल मच जायगा.

इतने में दो अनहोनी बातें हो गईं एक तो रईस ख़ाँ के सितार का तार टूट गया और दूसरे, भीमसेन दूसरी बार स्टेज के बाएं पैसेज से प्रकट हुए. फिर क्या था, उन्हें देखते ही पूरा पंडाल तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा.

रईस ख़ां ने समझा कि उन्हें सुनकर श्रोता खुशी जाहिर कर रहे हैं. अब तक टूटा तार लगाने में ही वह लगे थे. अभी तक उन्हें हालात का सही जायजा नहीं मिला. पर श्रोताओं के बढ़ते हंगामे से आखिर उन्हें हकीकत समझ में आ ही गई. उन्होंने हाथ जोड़ कर श्रोताओं से माफी मांगते हुए कहा, ‘अगरचे आप सुनना चाहेंगे तभी हम बजावेंगे अन्यथा स्टेज से विदा हो लेंगे.’

पर श्रोताओं पर तो भीमसेन का भूत सवार था—वे चिल्ला उठे, ‘अब हम पंडित जी को सुनना चाहते हैं—केवल पंडित जी को.’ आप अन्दाजा कीजिए कि जालंधर के श्रोताओं पर भीमसेन जोशी का कितना जबरदस्त असर था.

रात के 2 बजे लता मंगेशकर को फोन करते थे

मैंने कहीं पड़ा था कि, ‘कहते हैं एक न एक ऐब हसीनों में भी हुआ करता है.’ जोशीजी जैसे धुरंधर गायक में अगरचे कोई ऐब था तो वह उनका ‘दुख़्तरे रज’ से इश्क (सुराप्रेम). इस बारे में लता मंगेशकर ने स्वयं अपना अनुभव सुनाते हुए कहा कि, ‘कभी-कभी देर रात में फोन की घंटी बजती इस बेवक्त में कौन शहनाई बजा रहा है? झल्लाती हुई रिसीवर उठाती हूं उधर से मेरे बाबा (पिता दीनानाथ मंगेशकर) के नाट्यगीतों का गान सुनायी देता है, ‘सुरा मी बन्दिले’, आवाज पहचानने की जरूरत नहीं—ऐसी आवाज एक ही है—देर रात तक भीमसेन मेरे बाबा का संगीत सुनाते रहते और मैं ‘वाह-वाह’ करती रहती.’

इससे पता चलता है कि सुरा से ज्यादा उन पर सुर का नशा चढ़ा रहता था. वास्तव में सुर का नशा सब नशाओं से गाढ़ा होता है, ‘जहां न चढ़े दूजो रंग’.

दरअसल भीमसेन को सुरा प्रेम नहीं था. तनावपूर्ण पारिवारिक माहौल के चलते उससे उबरने के ख़ातिर वह शराब का सहारा लेने लगे थे जो धीरे-धीरे आदत बन गई. नशे की हालत में भी कोई गा सकता है वह भी सुर और लय में पगा यह कोई करिश्मा नहीं था बल्कि उनके हर पल सुर और लय में लिप्त रहने के कारण ही ऐसा सम्भव हो पाता था—सही मायने में उनका शरीर ‘गात्रावीणा’ था जो निरन्तर बजता रहता था.

किसी महफिल में वह गा रहे थे. जब ख़्याल सुना चुके तो श्रोता उनसे ठुमरी सुनाने की फरमाइश कर बैठे. आग्रहवश ठुमरी पेश करने से पहले वह बोल पड़े, ‘भई मैंने तो दो ही ठुमरियां सीखी जो मेरे दादा गुरु अब्दुल करीम ख़ां साहब को बहुत प्रिय थी. पहली ठुमरी है, ‘पिया बिन नाहिं आवत चैन’ यानी बिना पीये मुझे चैन नहीं आती और जब पी ली तो आप ‘पिया तो मानत नाहिं’—यह सुनकर श्रोताओं ने जोरों का ठहाका लगाया जिसमें एक ठहाका उनका भी मिल कर एक हो गया.

इसके बाद उन्होंने बारी-बारी से झिंझोटी और काफी की दोनों ठुमरियां रसीली अदाकारी से सुनाईं. सुनने वाले रसिया उन पर लट्टू. कितनी बारीक और सटीक विनोदप्रियता थी, भीमसेन की.

अफगान के शाह की मेहमाननवाजी

यूं तो अमेरिका-यूरोप आदि कई देशों का भ्रमण किया, लेकिन विदेशों में किए गए अपने कार्यक्रमों में अफगानिस्तान के शाह जहीर की मेहमाननवाजी और महफिल की वह खास तौर से चर्चा करते थे. भीमसेन बताते थे कि, ‘शाह जहीर राग संगीत के प्रेमी ही नहीं पारखी भी थे . खास कर उस्ताद अब्दुल करीम ख़ां के वह फैन थे.’

अफगानिस्तान की शहजादी ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी में पढ़ती थीं. वहां उन्हें जोशीजी का गाया ललित और शुद्ध-कल्याण का लॉन्ग प्ले डिस्क सुनने को मिला. रिकॉर्ड सुनकर वह इतनी प्रभावित हुईं कि अपने वालिद शाह जहीर को लिख भेजी कि, ‘काबुल राजप्रासाद में जोशीजी को आमंत्रित करके उनकी खास महफिल सजायी जाए.’

इसी बीच ऐसा संयोग हुआ कि आईसीसीआर की ओर से काबुल भेजे जाने वाले सांस्कृतिक शिष्टमंडल का मान्य सदस्य होकर भीमसेन जोशी को काबुल जाने का अवसर मिला. काबुल के दौरे ने उन्हें दोहरे सम्मान से नवाजा जबकि काबुल राजमहल में शाह जहीर ने विशिष्ट अतिथियों की उपस्थिति में शाही मेहमान के रूप में पंडित जी की खास महफिल शानोशौकत के साथ सजवाई.

मेजबान शाह ने उन्हें सम्मान स्वरूप काबुल में बने खास तरह का गलीचा और दुशाला देकर सम्मानित किया. काबुल पैलेस में स्वागत-सम्मान और शहाना मेहमाननवाजी का जिक्र विशेष रूप से जोशीजी बड़े फख्र से करते थे. स्वाभाविक ही है, राजप्रासादों-रजवाड़ों में हिन्दुस्तानी संगीत का जैसा भव्य श्रृंगार किया जाता रहा उससे भीमसेन भलीभांति अवगत थे.

बिसमिल्लाह खां से दोस्ती

पंडित भीमसेन जोशी के मुरीद बिसमिल्लाह ख़ां साहब कैसे बने इसका एक दिलचस्प किस्सा है. यह वाकया कोई सन् ’50 के दशक का है. हुआ यों कि लखनऊ रेडियो में ख़ां साहब की रिकॉर्डिंग थी. रिकार्डिंग में अभी देर थी तो ख़ाँ साहब चाय-सिगरेट पीने में मशगूल हो गये. तभी कोई कहने लगा कि पूना से जोशी साहब नाम के कोई गवैया आये हैं जो बहुत अच्छा गाते हैं.

बिसमिल्लाह ख़ां ने पूछा कि, ‘किस घराने के हैं?’ तो उसने बताया कि उनकी पूना गायकी है. ख़ां साहब हैरत में पड़ गये कि अब तक पूना गायकी के बारे में नहीं सुना. उत्सुकतावश वह भीमसेन जोशी वाले स्टूडियो कक्ष में चले गये. भीमसेन अपनी प्रस्तुति की बढ़त जैसे-जैसे करने लगे कि उनकी हर एक हरकत, तान-फिरत और अनूठी अदाकारी पर ‘वाह-वाह’ की दाद ख़ाँ साहब देते रहे.

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जब गाना खत्म हुआ तो भीमसेन की पीठ ठोंकते हुए बिसमिल्लाह ख़ाँ बोले, ‘अरे वाह! जोशी यार बहुत उम्दा गाते हो—किसके शागिर्द हो?’ तो किसी ने कहा कि, ‘उस्ताद अब्दुल करीम ख़ाँ के शागिर्द हैं.’ इस पर ख़ाँ साहब उछल पड़े, ‘तभी तो लग रहा था कि तुम्हारी गायकी की चलन किराने की है अरे यार, गले लग जाओ माशाअल्लाह क्या खूब गाते हो, तबीयत खुश हो गई’, कहते हुए बिसमिल्लाह ख़ाँ ने उन्हें खींच कर छाती से लगा लिया.

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