आज का इतिहास बेहद रोचक है. 3 मार्च कुछ ऐसी हस्तियों से जुड़ी तारीख है, जिनका नाम इतिहास से पन्नों में अमिट है. इनमें “टाटा समूह” के संस्थापक जमशेद जी टाटा, हास्य कलाकार जसपाल भट्टी, कारगिल युद्ध में पाकिस्तान को छठ्ठी का दूध याद दिलाने वाले नायब सूबेदार संजय कुमार, उर्दू के मशहूर शायर फिराक गोरखपुरी हैं और मुगल शासक औरंगजेब शामिल हैं।

जमशेद जी टाटा

जन्म- 3 मार्च, 1839 | निधन- 19 मई, 1904


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जमशेदजी नुसीरवानजी टाटा भारत के विश्व प्रसिद्ध औद्योगिक घराने “टाटा समूह” के संस्थापक थे। भारतीय औद्योगिक क्षेत्र में जमशेदजी का योगदान असाधारण और बहुत ही महत्त्वपूर्ण माना जाता है। भविष्य को भाँपने की अपनी अद्भुत क्षमता के बल पर उन्होंने वैज्ञानिक एवं तकनीकी शिक्षा के लिए बेहतरीन सुविधाएँ उपलब्ध करायीं और राष्ट्र को महाशक्ति बनने के मार्ग पर अग्रसर किया। टाटा ने ही मुंबई में विश्व प्रसिद्ध ‘ताजमहल होटल’ का निर्माण कराय था।

‘ताजमहल होटल’ के निर्माण के पीछे रोचक कहानी है। सिनेमा के जनक लुमायर भाईयों ने अपनी खोज के 6 महीनों बाद पहली फ़िल्म का शो मुम्बई में प्रदर्शित किया था। 7 जुलाई, 1896 को उन्होंने मुम्बई के तत्कालीन आलीशान वोटसन होटल में अपनी 6 अलग-अलग फ़िल्मों के शो आयोजित किए। इन शो को देखने के लिए मात्र ब्रिटिश लोगों को आमंत्रित किया गया था, क्योंकि वोटसन होटल के बाहर एक तख्ती लगी रहती थी, जिस पर लिखा होता था कि “भारतीय और कुत्ते होटल में नहीं आ सकते हैं”। ‘टाटा समूह’ के जमशेदजी टाटा भी लुमायर भाईयों की फ़िल्में देखना चाहते थे, लेकिन उन्हें वोटसन होटल में प्रवेश नहीं मिला। रंगभेद की इस घृणित नीति के ख़िलाफ़ उन्होंने आवाज भी उठाई। इस घटना के दो साल बाद ही वोटसन होटल की सारी शोभा धूमिल कर दे, एक ऐसे भव्य ‘ताजमहल होटल’ का निर्माण जमशेदजी ने शुरू करवा दिया। 1903 ई. में यह अति सुंदर होटल बनकर तैयार हो गया। कुछ समय तक इस होटल के दरवाज़े पर एक तख्ती भी लटकती थी, जिस पर लिखा होता था कि- “ब्रिटिश और बिल्लियाँ अंदर नहीं आ सकतीं।

जसपाल भट्टी

जन्म: 3 मार्च, 1955 | निधन: 25 अक्टूबर, 2012

जसपाल भट्टी प्रसिद्ध हास्य कलाकार थे। जसपाल जीवन की विडंबनाओं पर चुटीली टिप्पणियां करने वाले सधे हुए व्यंग्यकार भी थे। उन्होंने महंगाई, भ्रष्टाचार, नेताओं के पाखंड या जीवन के दूसरे सवालों पर बहुत सधे हुए संवाद किए। 80 और 90 के दशक में दूरदर्शन पर उनके कार्यक्रम ‘फ़्लॉप शो’ और ‘उल्टा−पुल्टा’ बेहद चर्चित हुए। कम ही लोग जानते होंगे कि जसपाल भट्टी ने पंजाब इंजीनियरिंग कॉलेज से इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग में स्नातक किया था। लेकिन उनका मन एक्टिंग में लगता था। अपने कॉलेज के दिनों में ही वह अपने नुक्कड़ नाटक नॉनसेंस क्लब से मशहूर हो गए थे। टेलीविजन में अपने कार्यक्रम प्रस्तुत करने से पूर्व वह चंडीगढ़ से प्रकाशित ‘द ट्रिब्यून’ में कार्टूनिस्ट भी रहे।

परमवीर चक्र विजेता नायब सूबेदार संजय कुमार

जन्म: 3 मार्च, 1976

कारगिल युद्ध के दौरान 13 जम्मू एण्ड कश्मीर राइफल में तैनात राइफल मैन संजय कुमार कश्‍मीर की मुश्कोह घाटी में चौकी नम्बर 4875 पर लड़ रहे थे। इस ठिकाने से कभी भी राष्ट्रीय राजमार्ग 1A पर गुजरने वाले दुश्मन पर गोलियाँ बरसाई जा सकती थीं। इसलिए बेहद ज़रूरी था कि यहाँ से दुश्मन को खदेड़ कर इस पर कब्जा किया जाए। इस ठिकाने पर फ़तह किए बिना द्रास के हैलीपैड पर हैलीकाप्टर उतारना सीधे-सीधे दुश्मन के निशाने पर आना था, इसलिए यह ठिकाना 4875 भारत के लिए एक ज़रूरी चुनौती था। 4 जुलाई 1999 को फ्लैट टॉप प्वाइंट 4875 की ओर कूच करने के लिए राइफल मैन संजय कुमार ने इच्छा जताई की कि वह अपनी टुकड़ी के साथ अगली पंक्ति में रहेंगे।

संजय कुमार जब हमले के लिए आगे बढ़े, तो एक जगह से दुश्मन ओटोमेटिक गन ने जबरदस्त गोलीबारी शुरू कर दी और टुकड़ी का आगे बढ़ना कठिन हो गया। ऐसे में स्थिति की गम्भीरता को देखते हुए राइफल मैन संजय कुमार ने तय किया कि उस ठिकाने को अचानक हमले से खामोश करा दिया जाए। इस इरादे से संजय ने यकायक उस जगह हमला करके आमने-सामने की मुठभेड़ में तीन दुश्मन को मार गिराया और उसी जोश में गोलाबारी करते हुए दूसरे ठिकाने की ओर बढ़े। राइफल मैन इस मुठभेड़ में खुद भी लहू लुहान हो गए, लेकिन अपनी ओर से बेपरवाह वह दुश्मन पर टूट पड़े। इस एकदम आकस्मिक आक्रमण से दुश्मन बौखला कर भाग खड़ा हुआ और इस भगदड़ में दुश्मन अपनी यूनीवर्सल मशीनगन भी छोड़ गया। संजय कुमार ने वह गन भी हथियाई और उससे दुश्मन का ही सफाया शुरू कर दिया। संजय के इस चमत्कारिक कारनामे को देखकर उसकी टुकड़ी के दूसरे जवान बहुत उत्साहित हुए और उन्होंने बेहद फुर्ती से दुश्मन के दूसरे ठिकानों पर धावा बोल दिया। इस दौर में संजय कुमार ख़ून से लथपथ हो गए थे लेकिन वह रण छोड़ने को तैयार नहीं थे और वह तब तक दुश्मन से जूझते रहे थे, जब तक वह प्वाइंट फ्लैट टॉप दुश्मन से पूरी तरह ख़ाली नहीं हो गया। इस तरह राइफल मैन संजय कुमार ने अपने अभियान में जीत हासिल की।

इस साहस का परिचय देने के लिए संजय कुमार को परमवीर चक्र से सम्मानित किया गया।

फ़िराक़ गोरखपुरी

जन्म- 28 अगस्त, 1896 | निधन- 3 मार्च, 1982

भारत के प्रसिद्धि प्राप्त और उर्दू के माने शायर फ़िराक़ गोरखपुरी का असली नाम ‘रघुपति सहाय’ था। ‘फिराक’ उनका तख़ल्लुस था। उन्हें उर्दू कविता को बोलियों से जोड़ कर उसमें नई लोच और रंगत पैदा करने का श्रेय दिया जाता है। शायद आपको नामालूम हो कि देश की आज़ादी के लिए संघर्षरत राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी ने ‘असहयोग आन्दोलन’ छेड़ा, तो फ़िराक़ गोरखपुरी ने अपनी नौकरी त्याग दी और आन्दोलन में कूद पड़े। उन्हें गिरफ्तार किया गया और डेढ़ साल की सज़ा भी हुई थी।

फ़िराक़ गोरखपुरी ने ग़ज़ल, नज़्म और रुबाई तीनों विधाओं में काफ़ी कहा है। रुबाई, नज़्म की ही विधा है, लेकिन आसानी के लिए इसे नज़्म से अलग कर लिया गया। उनके कलाम का सबसे बडा और अहम हिस्सा ग़ज़ल है और यही फ़िराक़ की पहचान है।

फिराक़ बेहद मुँहफट और दबंग शख्सियत भी थे। एक बार वे एक मुशायरे में शिरकत कर रहे थे, काफ़ी देर बाद उन्हें मंच पर आमंत्रित किया गया। फिराक़ ने माइक संभालते ही चुटकी ली और बोले, ‘हजरात! अभी आप कव्वाली सुन रहे थे अब कुछ शेर सुनिए’।

इसी तरह इलाहाबाद विश्वविद्यालय के लोग हमेशा फिराक़ और उनके सहपाठी अमरनाथ झा को लड़ा देने की कोशिश करते रहते थे। एक महफिल में फिराक़ और झा दोनों ही थे, एक साहब दर्शकों को संबोधित करते हुए बोले,’फिराक़ साहब हर बात में झा साहब से कमतर हैं” इस पर फिराक़ तुरंत उठे और बोले, “भाई अमरनाथ मेरे गहरे दोस्त हैं और उनमें एक ख़ास खूबी है कि वो अपनी झूठी तारीफ बिलकुल पसंद नहीं करते”। फिराक़ की हाज़िर-जवाबी ने उन हज़रत का मिजाज़ दुरुस्त कर दिया।

अपने अंतिम दिनों में जब शारीरिक अस्वस्थता निरंतर उन्हें घेर रही थी वो काफ़ी अकेले हो गए थे। अपने अकेलेपन को उन्होंने कुछ इस तरह बयां किया-

‘अब अक्सर चुप-चुप से रहे हैं, यूँ ही कभूं लब खोले हैं,

पहले फिराक़ को देखा होता अब तो बहुत कम बोले हैं’।

3 मार्च, 1892 में फ़िराक़ गोरखपुरी का देहांत हो गया।

औरंगज़ेब

जन्म- 4 नवम्बर, 1618 | निधन- 3 मार्च, 1707

मुग़ल बादशाहों में सिर्फ़ एक शख़्स भारतीय जनमानस के बीच जगह बनाने में नाकामयाब रहा वो था आलमगीर औरंगज़ेब। आम लोगों के बीच औरंगज़ेब की छवि हिंदुओं से नफ़रत करने वाले धार्मिक उन्माद से भरे कट्टरपंथी बादशाह की है, जिसने अपने राजनीतिक उद्देश्यों को पूरा करने के लिए अपने बड़े भाई दारा शिकोह को भी नहीं बख्शा। और तो और उसने अपने वृद्ध पिता तक को उनके जीवन के आखिरी साढ़े सात सालों तक आगरा के किले में कैदी बना कर रखा। लेकिन आपको इस बात का इल्म नहीं होगा कि औरंगज़ेब आशिक भी था।

औरंगज़ेब का जन्म 3 नवंबर,1618 को दोहाद में अपने दादा जहाँगीर के शासनकाल में हुआ था. वो शाहजहाँ के तीसरे बेटे थे. उनके चार बेटे थे और इन सभी की माँ मुमताज़ महल थीं. औरंगज़ेब ने इस्लामी धार्मिक साहित्य पढ़ने के अलावा तुर्की साहित्य भी पढ़ा और हस्तलिपि विद्या में महारत हासिल की. औरंगज़ेब और मुगल बादशाहों की तरह बचपन से ही धाराप्रवाह हिंदी बोलते थे.

इतिहासकार कैथरीन ब्राउन अपने एक लेख ‘डिड औरंगज़ेब बैन म्यूज़िक?’ में लिखती हैं कि औरंगज़ेब अपनी मौसी से मिलने बुरहानपुर गए थे, जहाँ हीराबाई ज़ैनाबादी को देख कर उनका उन पर दिल आ गया. हीराबाई एक गायिका और नर्तकी थीं.

औरंगज़ेब ने उन्हें एक पेड़ से आम तोड़ते देखा और उनके दीवाने हो गए. इश्क इस हद तक परवान चढ़ा कि वो उनके कहने पर कभी न शराब पीने की अपनी कसम तोड़ने के लिए तैयार हो गए. लेकिन जब औरंगज़ेब शराब का घूंट लेने ही वाले थे तो हीराबाई ने उन्हें रोक दिया. लेकिन एक साल बाद ही हीराबाई की मौत के साथ इस प्रेम कहानी का अंत हो गया. हीराबाई को औरंगाबाद में दफ़नाया गया.

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