कुछ चीज़ें जगह, तारीख और वक़्त नहीं देखतीं. अगर आपको पॉटी आई है तो आपको जाना ही पड़ेगा. एक आदमी बेचारा 2009 से ये बात रेलवे को समझाने की कोशिश कर रहा था, लेकिन रेलवे वालों के कान पर जूँ तक नहीं रेंग रही थी. खैर अब तो बात उस बन्दे के फेवर में ही हो गयी है.

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दरअसल एक परिवार ने लुधियाना रेलवे स्टेशन पर शिकायत दर्ज करवाई गयी थी कि उन्होंने अपने परिवार के कई सदस्यों का ट्रेन में रिज़र्वेशन करवाया था. लेकिन जब उन्हें बाथरूम का इस्तेमाल करने की ज़रूरत पड़ी तो वो नहीं कर पाए.


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भई, इसका कारण इसका ये थे कि कुछ अनचाहे ताऊ लोग, जो कि ट्रेन अपनी समझकर बिना रिज़र्वेशन करवाए ही रिज़र्व कोच में घुस आये थे. इस वजह से जगह ब्लाक हो गयी और ये जनाब वाशरूम तक नहीं पहुँच पाए. हरीशन बग्गा, जो कि खुद भी एक वकील है, ववाह 90 मिनट तक बाथरूम ब्लाक होने की वजह से बाथरूम प्रयोग नहीं कर सका.

इसी वजह से इन्होने अपनी शिकायत पहले लुधियाना स्टेशन पर दर्ज करवाई. वहां कार्रवाई न होते देख ये कंज्यूमर फोरम चले गए. 7 साल बाद इन्हें न्याय मिला और अदालत ने उनकी तकलीफ समझते हुए तीस हज़ार रुपये पेनाल्टी के तौर पर देने का आदेश सुनाया. ये शिकायत दर्ज करवाने वाले कोई और नहीं बल्कि क़ानून एवं न्याय मंत्रालय के लीगल डिप्टी एडवाइज़र दाव कान्त हैं.

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इन्होंने दावा किया था कि मेरे माता-पिता, बहन, पत्नी और बच्चों को उस बुरी परिस्थिति में मानसिक और शारीरिक रूप से काफी परेशानी हुयी. जिला कंज्यूमर फोरम में उन्होंने ये कम्प्लेंड दर्ज करवाई थी.

कोर्ट ने भी मान लिए कि पैसेंजर्स की सुविधाओं का ख्याल रखने की पूरी ज़िम्मेदारी रेलवे की है. साथ ही ये भी कि कोच में केवल अथराइज़ व्यक्ति ही घुसे अनाधिकृत नहीं. इसमें रेलवे नाकाम रहा है. ट्रेन में लाखों यात्री यात्रा करते हैं, ऐसे में रेलवे को ख्याल रखना होगा कि वैलिड टिकट वाले ही रिज़र्व कोच में घुसें.

अब तो भैया जी भीड़ हटाओ नहीं तो रुपये लाओ वाली कहावत आएगी. अगर हर बार पैसेंजर जीता तो ठीक, वरना कोर्ट के जीतने पर यही कहेगा, डूब गए 30,000 रुपये.

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