सिखों के आदि गुरु नानक देव जी ने सदियों पहले जिस लंगर की शुरुआत की थी, वह आज बढ़ते-बढ़ते इस मुकाम पर पहुंच गया है कि लाखों लोग प्रसाद ग्रहण करते हैं। दीन-दुखियारों को भोजन मिलता है, तो बड़े-बड़े लोग भी लंगर का प्रसाद ग्रहण करना सौभाग्य समझते हैं।

ऊंच-नीच खत्म करने के लिए शुरुआत

गुरु नानक ने लगभग 15 वीं शताब्दी में लंगर की शुरुआत की थी। उन्होंने ऊंच-नीच, जात-पात और अंधविश्वास को समाप्त करने के लिए एक साथ जमीन पर बैठकर भोजन करने की परंपरा शुरू की। सिखों के तीसरे गुरु अमरदास जी ने लंगर की इस परंपरा को आगे बढ़ाया।

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हर मौके पर लंगन का आयोजन

आज पूरी दुनिया में जहां भी सिख बसे हैं, वहां लंगर जरूर मिल जाएगा। सिख समुदाय में खुशी के मौकों के अलावा त्योहार, गुरु पर्व, मेले व शुभ अवसर पर लंगर आयोजित होता है। इसके अलावा गुरुद्वारों मेंं नियमित लंगर लगता है, जिसमें बड़ी संख्या में लोग प्रसाद लेते हैं।

बादशाह अकबर ने भी ग्रहण किया प्रसाद

बताया जाता है कि मुगल बादशाह अकबर ने भी गुरु के लंगर में बैठकर प्रसाद चखा था। शनिवार को गुरु नानक देव जी का प्रकाश पर्व है, तो इस मौके पर यह भी जान लीजिए कि अमृतसर के स्वर्ण मंदिर में दुनिया का सबसे बड़ा लंगर आयोजित किया जाता है।

स्वर्ण मंदिर में लगता सबसे बड़ा लंगर

स्वर्ण  मंदिर में रोज हजारों लोगों के लिए खाना बनता है। इस जगह पर अमीर-गरीब, छोटे-बड़े, ऊंच-नीच का कोई भेदभाव नहीं है। खास मौकों पर यहां दो लाख रोटियां तक बनती हैं।

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